
घर में अगर सबसे ज़्यादा कोई इंसान हमें प्यार करता है… तो वही इंसान सबसे ज़्यादा डाँटता भी है—मम्मी!
मम्मी की डाँट एक ऐसी चीज़ है जो हर भारतीय बच्चे ने बचपन से लेकर बड़े होने तक झेली है। मज़ेदार बात तो ये है कि उनकी डाँट का सिलेबस कभी खत्म ही नहीं होता। चाहे आपकी उम्र 10 साल हो या 30 साल… मम्मी के ताने हमेशा अपडेट होते रहते हैं!
“सारा दिन बस मोबाइल ही देखो!”
सुबह आँख खुली नहीं कि…
मम्मी:
“उठ जा! मोबाइल बाद में देख लेना, पहले इंसान बन जा!”
और अगर गलती से रात को 5 मिनट ज़्यादा फोन चला लिया…
“फोन में ही शादी कर ले… वहीं रह लेना!”
सच कहें तो मोबाइल से ज़्यादा चार्ज तो मम्मी की डाँट रहती है।

“हमारे ज़माने में…”
मम्मी का सबसे बड़ा सुपरपावर है—हर बात की तुलना अपने ज़माने से करना।
- “हमारे ज़माने में सुबह 5 बजे उठ जाते थे।”
- “हमारे ज़माने में इतना खर्चा नहीं होता था।”
- “हमारे ज़माने में माँ-बाप से आँख मिलाकर बात नहीं करते थे।”
अब हमें कौन समझाए कि उनके ज़माने में Instagram भी नहीं था!
रसोई की सबसे बड़ी अदालत
अगर आपने खाने में ज़रा भी नखरे दिखा दिए…
“इतनी मेहनत से बनाया है… होटल खोल दूँ क्या?”
और अगर खाना पसंद आ गया…
“आज भूख ज़्यादा लगी है क्या?”
मतलब खुश भी हो जाओ तो शक, न खाओ तो भी शक!
मम्मी का Google Search Engine
मम्मी को सब पता होता है…
- तुम कब सोए।
- कब उठे।
- कितनी देर मोबाइल चलाया।
- कितनी बार फ्रिज खोला।
- और सबसे ज़रूरी… पैसे किस चीज़ पर उड़ाए!
Google भी कभी-कभी गलत जवाब दे सकता है, लेकिन मम्मी कभी नहीं!
डाँट में भी प्यार छिपा होता है
मज़े की बात ये है कि 10 मिनट पहले जो मम्मी डाँट रही थीं…
वही थोड़ी देर बाद पूछती हैं…
“चाय पिएगा?”
“कुछ खाया कि नहीं?”
“बाहर जा रहा है तो हेलमेट पहन लेना।”
यही तो मम्मी हैं…
डाँट अलग, प्यार अलग… लेकिन दोनों की मात्रा हमेशा फुल रहती है।

मम्मी के ऑल टाइम सुपरहिट ताने
- “कमरा है या रेलवे स्टेशन?”
- “बिजली का बिल तेरे पापा भरेंगे?”
- “तुझे बोल-बोलकर मैं ही बूढ़ी हो गई!”
- “कपड़े अलमारी में खुद नहीं चले जाएंगे!”
- “तेरी शादी करा दूँ क्या? फिर पता चलेगा!”
- “घर में नौकरानी समझ रखा है क्या?”
- “इतना भी पढ़ लेता तो कलेक्टर बन जाता!”
इन डायलॉग्स पर तो पूरा भारत एकजुट हो सकता है!
मम्मी की डाँट क्यों याद आती है?
जब हम पढ़ाई या नौकरी के लिए घर से दूर चले जाते हैं, तब वही डाँट, वही आवाज़ और वही ताने सबसे ज़्यादा याद आते हैं।
अब कोई नहीं कहता…
“लाइट बंद कर!”
“खाना खा ले!”
“इतनी देर तक मत जाग!”
तब समझ आता है कि मम्मी की डाँट दरअसल उनकी चिंता और प्यार की भाषा थी।
मम्मी के ताने सुनते समय भले ही गुस्सा आता हो, लेकिन बाद में वही बातें सबसे प्यारी यादें बन जाती हैं। उनकी हर डाँट में हमारी फिक्र छिपी होती है और हर ताने के पीछे हमारी भलाई।
इसलिए अगली बार अगर मम्मी कहें…
“सारा दिन फोन ही चलाता रहता है!”
तो मुस्कुरा देना… क्योंकि दुनिया में ऐसा प्यार और कहीं नहीं मिलेगा।
“मम्मी की डाँट मुफ्त मिलती है… लेकिन इसकी कीमत उम्र बढ़ने के बाद समझ आती है!”

