गढ़चिरौली, 10 अगस्त 2026: महाराष्ट्र का गढ़चिरौली जिला लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों और हिंसा के कारण चर्चा में रहा। लेकिन अब इसी क्षेत्र से एक अलग और उम्मीद भरी तस्वीर सामने आ रही है। आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे कई पूर्व नक्सली अब नौकरी, उद्योग, खेती और शिक्षा के जरिए अपनी जिंदगी को नई दिशा दे रहे हैं।
10 साल की उम्र में जंगल की राह, अब स्टील फैक्ट्री में नौकरी
इस बदलाव की सबसे चर्चित कहानियों में से एक रमेश रेंकाटवो की है। एटापल्ली तहसील के इतुनार गांव से ताल्लुक रखने वाले रमेश महज 10 साल की उम्र में वामपंथी उग्रवाद के प्रभाव में आ गए थे। करीब 13 साल जंगलों में बिताने के बाद उन्होंने आंदोलन छोड़कर आत्मसमर्पण किया।
आत्मसमर्पण के बाद उनका जीवन आसान नहीं था। वे लंबे समय तक दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते रहे। लेकिन गढ़चिरौली में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ने के साथ उन्हें स्टील फैक्ट्री में नौकरी मिली। आज वे क्रेन ऑपरेटर के रूप में काम कर रहे हैं, नियमित वेतन पा रहे हैं और सरकार की पुनर्वास योजना के तहत बनाए गए घर में अपनी पत्नी और चार बेटियों के साथ रह रहे हैं।
उनकी प्राथमिकता अब अपने बच्चों का भविष्य है—वे चाहते हैं कि उनकी बेटियों को वह शिक्षा और अवसर मिलें जो उन्हें खुद नहीं मिल सके।
उद्योगों ने खोले रोजगार के नए दरवाजे
गढ़चिरौली में औद्योगिकीकरण की रफ्तार बढ़ने के साथ पूर्व नक्सलियों के लिए रोजगार के अवसर भी सामने आए हैं। Lloyds Metal & Energy Ltd ने जिले में पूर्व माओवादियों को रोजगार देने वाली शुरुआती औद्योगिक कंपनियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कंपनी ने करीब 24 पूर्व नक्सलियों, जिनमें आठ दंपति भी शामिल थे, को रोजगार दिया।
यह सिर्फ नौकरी देने तक सीमित नहीं है। उद्योगों में काम कर रहे कुछ पूर्व नक्सली अब दूसरे लोगों को भी विभिन्न कौशल सिखाने में मदद कर रहे हैं। यानी पुनर्वास की प्रक्रिया में वे केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि दूसरों के लिए मार्गदर्शक भी बन रहे हैं।
पुनर्वास सिर्फ आर्थिक मदद तक सीमित नहीं
गढ़चिरौली में पुनर्वास का मॉडल अब केवल आर्थिक सहायता देने तक सीमित नहीं है। जून 2026 में महाराष्ट्र के मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल और DGP सदानंद दाते ने नवेगांव स्थित नवजीवन पुनर्वास कॉलोनी का दौरा किया था। उस समय बताया गया कि जिले में अब तक 819 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है।
पूर्व कैडरों को रोजगार और कौशल विकास से जोड़ने के साथ-साथ उन्हें आधार, पैन, ई-श्रम कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसी जरूरी दस्तावेजी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। महिलाओं को सिलाई मशीन और पुरुषों को कृषि से जुड़े उपकरण दिए जाने की जानकारी भी सामने आई थी।
शिक्षा भी बनी बदलाव की अहम कड़ी
पुनर्वास प्रक्रिया में शिक्षा को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। Project Sanjeevani के तहत आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व माओवादियों के लिए साक्षरता और कौशल विकास कार्यक्रम शुरू किए गए। कुछ लोग दोबारा पढ़ाई शुरू कर रहे हैं, जबकि अन्य को वेल्डिंग, फिटिंग, मैकेनिक और दूसरे ट्रेड में प्रशिक्षण के अवसर दिए जा रहे हैं।
यह बदलाव खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्होंने कम उम्र में पढ़ाई छोड़कर जंगल का रास्ता अपना लिया था।
गढ़चिरौली की बदलती तस्वीर
पूर्व नक्सलियों का मुख्यधारा में लौटना गढ़चिरौली में हो रहे बड़े सामाजिक और आर्थिक बदलाव का एक हिस्सा है। क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होने के साथ उद्योग, सड़क, शिक्षा और रोजगार से जुड़े निवेश भी बढ़ रहे हैं। हाल की रिपोर्टों में गढ़चिरौली को उभरते हुए औद्योगिक केंद्र के रूप में देखा जा रहा है।
स्टील और खनिज आधारित उद्योगों के विस्तार से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार की संभावनाएं बढ़ी हैं। ऐसे में पुनर्वास और औद्योगिक विकास एक-दूसरे के पूरक बनते दिखाई दे रहे हैं।
सबसे बड़ा बदलाव सोच में
गढ़चिरौली की यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति या कुछ लोगों की कहानी नहीं है। यह इस बात का उदाहरण है कि सुरक्षा के साथ शिक्षा, रोजगार और पुनर्वास को जोड़ने पर संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक बदलाव की नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।
जहां कभी जंगल और हिंसा की खबरें सुर्खियां बनती थीं, वहीं अब रोजगार, उद्योग और बच्चों की शिक्षा की कहानियां सामने आ रही हैं।
रमेश रेंकाटवो जैसे लोगों के लिए यह बदलाव सिर्फ नौकरी मिलने तक सीमित नहीं है। यह उस जिंदगी की शुरुआत है जिसमें परिवार, घर, नियमित आय और बच्चों के बेहतर भविष्य के सपने शामिल हैं।
निष्कर्ष
गढ़चिरौली आज एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व नक्सलियों का उद्योगों में काम करना, बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देना और समाज की मुख्यधारा में लौटना इस बदलाव की मानवीय तस्वीर पेश करता है।
हिंसा से विकास की ओर यह सफर आसान नहीं है, लेकिन गढ़चिरौली में नई जिंदगी शुरू कर चुके लोगों की कहानियां बताती हैं कि बदलाव संभव है।
